Tuesday, February 7, 2017

मेरी रुबाइयाँ

प्रेयसी को....

तुम
पहले प्यार की पहली बयार
चेहरे पर आब
गुल सी तुम
लेकर ग़ुलाब
खाएं कसम
भूले न हम
गुज़ार दे यूँ ही जिंदगी
रहो तुम पास
मेरे साथ-साथ।

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क्यूँ चाहा था इस क़दर
जब अंजाम से वाकिफ़ थे तुम
मैंने तो इबादत की थी
अंदाज-ए-काफ़िर से
वाकिफ़ न थे।

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कर पाश में लिए साथ में,
अधरों पर धर अपने अधर।
मुझ चित्त को व्यथित कर,
मदिरा समझ न सोपान कर।।

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सौंप दिया था सब
जो मेरा अपना था
ख़्वाहिश थी सिर्फ इतनी
तुम्हें 'अपना' लेना था।

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