Tuesday, February 7, 2017

कविता संग्रह

सूर्य नमन
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हे सूर्य देव!
प्रचण्डता के मापदंड,
ताप के अभिजात तुम।
हर सुबह तेरी किरण से
जीवन का संचार तुम।
हर श्वास का आभार तुम,
हो धरा का श्रृंगार तुम।
हम करते तुझको कोटि नमन!
हे सूर्य देव तुझको नमन!!

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हमारा देश
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न राग हो न द्वेष हो
मन में न कोई क्लेश हो
सब धर्म हो वन्दित यहाँ
वंदना का न वेष हो
जाति बन्धन से परे
सदभावना का समावेश हो
अज़ान से ओंकार तक
समभाव का उदघोष हो
धन धान्य से परिपूर्ण हो
दरिद्रता न अवशेष हो
ऐसा हमारा देश हो
ऐसा हमारा देश हो।

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दरमियां जो भी फ़ासले हैं
वज़ह वो है सिर्फ इन्सानी
रूह तो कब की मिल चुकी
दीवारें 'मैं' कि हैं बाक़ी
                     दिलों को खोल दो अब भी
                     न जानें जाएँगी कितनी जानें
                     शरम तब तुझको आयेगी
                     जब ज़ाया जायेगी क़ुरबानी
तुम्हारे मज़हब से भी बढ़कर
मज़हब इंसानियत का है बाक़ी
बन्दगी करो सिर्फ तुम इसकी
दरमियां फ़ासले न रहेंगें फिर बाक़ी।

मेरी रुबाइयाँ

प्रेयसी को....

तुम
पहले प्यार की पहली बयार
चेहरे पर आब
गुल सी तुम
लेकर ग़ुलाब
खाएं कसम
भूले न हम
गुज़ार दे यूँ ही जिंदगी
रहो तुम पास
मेरे साथ-साथ।

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क्यूँ चाहा था इस क़दर
जब अंजाम से वाकिफ़ थे तुम
मैंने तो इबादत की थी
अंदाज-ए-काफ़िर से
वाकिफ़ न थे।

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कर पाश में लिए साथ में,
अधरों पर धर अपने अधर।
मुझ चित्त को व्यथित कर,
मदिरा समझ न सोपान कर।।

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सौंप दिया था सब
जो मेरा अपना था
ख़्वाहिश थी सिर्फ इतनी
तुम्हें 'अपना' लेना था।

Saturday, February 4, 2017

दोहे

मेहँदी से कुछ गुर सिख ले बनने को इंसान!
जितना खुद को पीस ले उतनउ बनो महान!!


घर का कचरा जोड़ कर बेच दियो कबाड़!
कबहु मन में झांक लो कचरा भरा तमाम!!


उड़ती मन पतंग देख, जियरा न हर्षाये !
जिंदगी की डोर ये, न जाने कब कट जाये!!